शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

फूल से नाजुक रिश्ते

पागल की डायरी

एक बार टेलीविजन में फेवीकोल का विज्ञापन देखा...भाई साहब क्या बताएं आपको...कसम से क्या मजबूती का जोड़ था...लेकिन जब कभी दुनिया में रिश्तों के जोड़ों को देखता हूं...उनकी पवित्रता को देखकर दिल में मनन करता हूं...तो नही समझ आता है कि रिश्ते इतने कमजोर कैसे हो गए...गर मां के दूध और खून के रिश्तों को मजबूत कहा जाए...तो भाई भाई के खून का प्यासा क्यों हो रहा है...मां दरवाजे के बाहर बैठकर दो रोटी खाने के लिए इंतजार क्यों करती...क्यों एक भाई अपनी बहन का बलात्कार क्यों करता...साहब मामला पूरा...अहसासों,भावनाओं और रिश्ते की पवित्रता का है...भले ही रिश्ते निभाने के फेर में ये दुनिया उसे चरित्रहीन का तमगा क्यों न दे दे...मगर दिल में खुद पर विश्वास और अडिगता इतनी हो कि सारी दुनिया से लड़ने का माद्दा तुम रख पाओ...एक बारगी लोग तुमको अपवित्र जरुर कहेंगे...मगर मत भूलो कि गंगा में इतनी गंदगी होने के बाद भी लोग आज भी शुभ कामों में गंगा जल का प्रयोग करते हैं...आज की गायें भले कितने ही अवशिष्ट क्यों न खाएं...मगर घर का दरवाजा आज भी गाय के गोबर से ही लीपा जाता है...मगर दोस्तो सब एहसासों का खेल है...दिल में श्रद्धा और मन में विश्वास अगर हो तो दुनिया का कोई काम खराब नही होता...और दुनिया का कोई इंसान गलत नही होता...अगर समाज की नजरों में कोठे पर जाना एक गुनाह है...तो मै कहता हूं कि निराला,जयशंकर प्रसाद जैसे कवि गुनाहगार हैं....गुनाह करते हुए भी उन्होने देश साहित्य की सेवा की...तो साथियो,मन की पवित्रता,रिश्तों का अहसास बनाए रखिए...दुनिया में रिश्ते बहुत नाजुक होते है...जरा कसकर पकड़ो तो मर जाते हैं...और हल्के हाथों से पकड़ो तो हाथ से निकल जाते हैं...

एक पागल
कृष्ण कुमार द्विवेदी